सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

7 नवंबर | विश्व विधार्थी दिवस | world student day

 आज 7 नवंबर है, आज ही के दिन बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी ने पहली कक्षा में दाखिला लिया था 


किसको पता था कि उस वक़्त का नन्हा सा बालक एक झटके में 5000 सालो के राजतंत्र को लोकतंत्र में बदल देगा..


इसलिए इस दिन को "विश्व विधार्थी दिवस" के नाम से जाना जाता है 

      विद्यार्थि दिवस की आप सभी को शुभकामनाएं।


#world_students_day 




<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-5460100888476302"

     crossorigin="anonymous"></script>


जय भीम जय भारत नमोः बुद्धाय


बी.एल. बौद्ध

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बाबा साहब की अस्थियां आगरा में कब रखी गई | बाबा साहब की हस्तियां आगरा में किसके द्वारा रखी गई

   बाबा साहब की अस्थियां आगरा में : 13 फरवरी....   आगरा के पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार में रखी है बाबा साहेब की अस्थियां..    13.2.1957 को बाबासाहेब के पुत्र यशवंत राव अंबेडकर द्वारा उनकी अस्थियां आगरा लाई गईं और पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार में स्थापित की गयी है। हर वर्ष छह दिसम्बर को डॉ. अंबेडकर के महापरिनिवार्ण दिवस पर ये अस्थियां जनता के दर्शनार्थ बुद्ध विहार में रखी जाती हैं।       पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार की ज़मीन रक्षा विभाग की है और वह इस ऐतिहासिक बौद्ध विहार को हटाने के लिए बार बार कहता है। भदंत ज्ञान रत्न महाथेरा भारत सरकार से अपील करते हुए कहते है की इस ज़मीन को रक्षा विभाग से लेकर हमे दिया जाये ताकि हम बाबा साहेब की याद में भव्य स्मारक का निर्माण करा सके। विहार के हालत अभी खस्ता है।    18.3.1956 को रामलीला मैदान, आगरा में सभा करने के बाद बाबा साहब ने पूर्वोदय चक्कीपाट में तथागत बुद्ध की प्रतिमा अपने हाथों से स्थापित की जो आज भी पूर्वोदय बुद्ध विहार में देखी जा सकती है।      जुलाई 1957 को बौद्ध भिक्षु कौडि...

दीपावली क्यों मनाया जाता है पूरी जानकारी पढ़िए

 इतिहास के पन्नों से... ‘दीपदानोत्सव’,   दीपावली अथवा ‘दीपदानोत्सव’........ ✍️की बुद्ध धम्म में ऐतिहासिकता ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाय तो ‘दीपावली’ को ‘दीपदानोत्सव’ नाम से जाना जाता था और यह वस्तुतः एक बौद्ध पर्व है जिसका प्राचीनतम वर्णन तृतीय शती ईसवी के उत्तर भारतीय बौद्ध ग्रन्थ ‘अशोकावदान’ तथा पांचवीं शती ईस्वी के सिंहली बौद्ध ग्रन्थ ‘महावंस’ में प्राप्त होता है। सांतवी शती में सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी नृत्यनाटिका ‘नागानन्द’ में इस पर्व को ‘दीपप्रतिपदोत्सव’ कहा है।  ✍️कालान्तर में इस पर्व का वर्णन पूर्णतः परिवर्तित रूप में ‘पद्म पुराण’ तथा ‘स्कन्द पुराण’ में प्राप्त होता है जो कि सातवीं से बारहवीं शती ईसवी के मध्य की कृतियाँ हैं। तृतीय शती ईसा पूर्व की सिंहली बौध्द ‘अट्ठकथाओं’ पर आधारित ‘महावंस’ पांचवीं शती ईस्वी में भिक्खु महाथेर महानाम द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसके अनुसार बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद तथागत बुद्ध अपने पिता शुद्धोदन के आग्रह पर पहली बार कार्तिक अमावस्या के दिन कपिलवस्तु पधारे थे। कपिलवस्तु नगरवासी अपने प्रिय राजकुमार, जो अब बुद्धत्व प्राप्त क...

धम्मदीक्षा दिवस (धम्मचक्रप्रवर्तन दिवस) 14 अक्टूबर

 धम्मदीक्षा दिवस (धम्मचक्रप्रवर्तन दिवस)14अक्टूबर पर आप सभी साथियों को बहुत बहुत हार्दिक बधाई-- डा.बाबासाहब अम्बेडकर ने 1935 में घोषणा की थी कि मैं हिंदू धर्म में पैदा अवश्य हुआ हूं परंतु हिंदू के रूप से मरूँगा नहीं  उन्होंने सभी धर्मों का भली-भीति अध्ययन किया और पाया कि केवल बौद्ध धम्म ही विज्ञान की कसौटी पर पूरा उतरता हे ये धर्म समानता,स्वतंत्रता,न्याय व प्रज्ञा (ज्ञान) पर आधारित है,इसमें मानव प्रेम, अपनापन ब भाईचारा है यह भ्रमो के जाल में नही फसाता है इसमें कर्मकांड और पाखंड नहीं है, यह ना तो स्वर्ग या मुक्ति का प्रलोभन देता है और ना ही आत्मा और परमात्मा के चक्कर में उलझाता है इसमें न तो देवी-देवताओं को खुश करना होता है और न ही देवी-देवताओं से डरना होता है,इसमें देवी-देवताओं द्वारा किसी अनिष्ट का भी कोई डर नहीं होता, इसमें तो केबल बुद्ध की शिक्षाओं को जीवन में उतार कर दुख और भय से मुक्त होकर ‘संपूर्ण मानव’ जीवन जीना होता है, उन्होंने पाया कि बौध धम्म ‘अत्त दीपो भव’ अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो का सिद्धांत देकर मनुष्य को अपने आप पर निर्भर होना सिखाता है.    उन्होंने ...