सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

भारत को विश्व गुरु क्यों कहा जाता हैं जानिए

 सम्राट अशोक की जन्म जयंती हमारे देश में नहीं बनाई जाती ...


मैं बहुत सोचता हूं पर उत्तर नहीं मिलता! आप भी इन प्रश्नों पर विचार करें!


1. जिस सम्राट के नाम के साथ संसार भर के इतिहासकार “महान” शब्द लगाते हैं


2. जिस सम्राट का राज चिन्ह "अशोक चक्र" भारतीय अपने ध्वज में लगते है


3. जिस सम्राट का राज चिन्ह "चारमुखी शेर" को भारतीय राष्ट्रीय प्रतीक मानकर सरकार चलाते हैं, और "सत्यमेव जयते" को अपनाया है


4. जिस देश में सेना का सबसे बड़ा युद्ध सम्मान सम्राट अशोक के नाम पर "अशोक चक्र" दिया जाता है


5. जिस सम्राट से पहले या बाद में कभी कोई ऐसा राजा या सम्राट नहीं हुआ, जिसने अखंड भारत (आज का नेपाल, बांग्लादेश, पूरा भारत, पाकिस्तान, और अफगानिस्तान) जितने बड़े भूभाग पर एक-छत्र राज किया हो


6. सम्राट अशोक के ही समय में 23 विश्वविद्यालयों की स्थापना की गई, जिसमें तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला, कंधार आदि विश्वविद्यालय प्रमुख थे! इन्हीं विश्वविद्यालयों में विदेश से छात्र उच्च शिक्षा पाने भारत आया करते थे


7. जिस सम्राट के शासन काल को विश्व के बुद्धिजीवी और इतिहासकार भारतीय इतिहास का सबसे स्वर्णिम काल मानते हैं 


8. जिस सम्राट के शासन काल में भारत विश्व गुरु था, हालांकि सोने की चिड़िया भारत समुद्रगुप्त के शासनकलों में था लेकिन महान सम्राट अशोक के शासनकाल को भी सोने की चिड़िया भारत को कहा जाता था! जनता खुशहाल और भेदभाव-रहित थी


9. जिस सम्राट के शासन काल में सबसे प्रख्यात महामार्ग "ग्रेड ट्रंक रोड" जैसे कई हाईवे बने, 2000 किलोमीटर लंबी पूरी सडक पर दोनों ओर पेड़ लगाये गए, सरायें बनायीं गईं, मानव तो मानव, पशुओं के लिए भी प्रथम बार चिकित्सा घर, वैधशाला (हॉस्पिटल) खोले गए, पशुओं को मारना बंद करा दिया गया


10. ऐसे महान सम्राट अशोक, जिनकी जयंती उनके अपने देश भारत में क्यों नहीं मनायी जाती, न ही कोई छुट्टी घोषित की गई है ? 


दुख: है कि जिन नागरिकों को ये जयंती मनानी चाहिए, वो अपना इतिहास ही भुला बैठे हैं, और जो जानते हैं वो ना जाने क्यों मनाना नहीं चाहते।


तथ्य निम्नलिखित हैं 


*जन्म 04  अप्रैल*

*जन्म वर्ष 302 ई पू* 

*राजतिलक - 268 ई पू* 

*देहावसान - 232 ई पू* 

*पिताजी का नाम - बिन्दुसार* 

*माताजी का नाम - सुभद्राणी*


11. "जो जीता वही चंद्रगुप्त" ना होकर "जो जीता वही सिकन्दर" कैसे हो गया…?


 जबकि ये बात सभी जानते हैं कि सिकन्दर की सेना ने चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रभाव को देखते हुए ही लड़ने से मना कर दिया था! बहुत ही बुरी तरह से मनोबल टूट गया था और उसको अपने प्राणों से हाथ धोकर वापस लौटना पड़ा था।


कृपया हम सब मिल कर बाक़ी साथियों को भी जागरूक करें! 

आइए मिल कर इस ऐतिहासिक भूल को सही करने का हर संभव प्रयास करें 


प्रयास करें कि अपने संस्थान में  आगामी  04 अप्रैल सम्राट अशोक जन्मदिन के रूप में सम्मान व उत्साह के साथ मनाया जाए।

   
                           जय भीम नमो बुद्धाय

बी.एल. बौद्ध


<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-5460100888476302"

     crossorigin="anonymous"></script>

<ins class="adsbygoogle"

     style="display:block; text-align:center;"

     data-ad-layout="in-article"

     data-ad-format="fluid"

     data-ad-client="ca-pub-5460100888476302"

     data-ad-slot="9626616573"></ins>

<script>

     (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({});

</script>


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बाबा साहब की अस्थियां आगरा में कब रखी गई | बाबा साहब की हस्तियां आगरा में किसके द्वारा रखी गई

   बाबा साहब की अस्थियां आगरा में : 13 फरवरी....   आगरा के पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार में रखी है बाबा साहेब की अस्थियां..    13.2.1957 को बाबासाहेब के पुत्र यशवंत राव अंबेडकर द्वारा उनकी अस्थियां आगरा लाई गईं और पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार में स्थापित की गयी है। हर वर्ष छह दिसम्बर को डॉ. अंबेडकर के महापरिनिवार्ण दिवस पर ये अस्थियां जनता के दर्शनार्थ बुद्ध विहार में रखी जाती हैं।       पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार की ज़मीन रक्षा विभाग की है और वह इस ऐतिहासिक बौद्ध विहार को हटाने के लिए बार बार कहता है। भदंत ज्ञान रत्न महाथेरा भारत सरकार से अपील करते हुए कहते है की इस ज़मीन को रक्षा विभाग से लेकर हमे दिया जाये ताकि हम बाबा साहेब की याद में भव्य स्मारक का निर्माण करा सके। विहार के हालत अभी खस्ता है।    18.3.1956 को रामलीला मैदान, आगरा में सभा करने के बाद बाबा साहब ने पूर्वोदय चक्कीपाट में तथागत बुद्ध की प्रतिमा अपने हाथों से स्थापित की जो आज भी पूर्वोदय बुद्ध विहार में देखी जा सकती है।      जुलाई 1957 को बौद्ध भिक्षु कौडि...

दीपावली क्यों मनाया जाता है पूरी जानकारी पढ़िए

 इतिहास के पन्नों से... ‘दीपदानोत्सव’,   दीपावली अथवा ‘दीपदानोत्सव’........ ✍️की बुद्ध धम्म में ऐतिहासिकता ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाय तो ‘दीपावली’ को ‘दीपदानोत्सव’ नाम से जाना जाता था और यह वस्तुतः एक बौद्ध पर्व है जिसका प्राचीनतम वर्णन तृतीय शती ईसवी के उत्तर भारतीय बौद्ध ग्रन्थ ‘अशोकावदान’ तथा पांचवीं शती ईस्वी के सिंहली बौद्ध ग्रन्थ ‘महावंस’ में प्राप्त होता है। सांतवी शती में सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी नृत्यनाटिका ‘नागानन्द’ में इस पर्व को ‘दीपप्रतिपदोत्सव’ कहा है।  ✍️कालान्तर में इस पर्व का वर्णन पूर्णतः परिवर्तित रूप में ‘पद्म पुराण’ तथा ‘स्कन्द पुराण’ में प्राप्त होता है जो कि सातवीं से बारहवीं शती ईसवी के मध्य की कृतियाँ हैं। तृतीय शती ईसा पूर्व की सिंहली बौध्द ‘अट्ठकथाओं’ पर आधारित ‘महावंस’ पांचवीं शती ईस्वी में भिक्खु महाथेर महानाम द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसके अनुसार बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद तथागत बुद्ध अपने पिता शुद्धोदन के आग्रह पर पहली बार कार्तिक अमावस्या के दिन कपिलवस्तु पधारे थे। कपिलवस्तु नगरवासी अपने प्रिय राजकुमार, जो अब बुद्धत्व प्राप्त क...

हर हर महादेव, मे महादेव एक बौद्ध भिखु थे जो बौद्ध मार्ग को नार्थ इंडिया से साउथ इंडिया मे ले गए | महादेव | हर हर महादेव

 हर हर महादेव, मे महादेव एक बौद्ध भिखु थे जो बौद्ध मार्ग को नार्थ इंडिया से साउथ इंडिया मे ले गए सम्राट असोक के समय मे, फिर साउथ इंडिया से महादेव थेर के अनुयायी बढ़ने लगे, संघ बढ़ा तो हर हर महादेव भी प्रचलित हुआ, फिर 9th सेंचुरी मे केरल से शैव मार्ग उभरा, जिसे प्रच्छन्न बौद्ध भी कहा गया. लोग अब भी हर हर महादेव कर रहे है बस महादेव का मतलब शिव समझा दिया धूर्त ने। पर सच्चाई कब तक छुपती?  सीरीलंका के दीप वंश परम्परा के लेखनी की आखिरी किताब कही जाने वाली शासन वंश ने पोल खोल ही दी। Reference : शासन वंश (बुद्ध धम्म का इतिहास)  न जय भीम जय भारत नमोः बुद्धाय बी.एल. बौद्ध