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चंद्रगुप्त मौर्य को एंड्रो - कोट्टस ( Andro- Cottus ) क्यों कहा जाता है?

 मौर्यों का जमाना था। भारत और यूनान के बीच आवाजाही थी। तब ग्रीक और प्राकृत शब्दों का मेलजोल भी था। ग्रीक में एक शब्द " एंड्रो - दमस " ( Andro - Damas ) का प्रचलन है। एंड्रो - दमस में दो शब्दों का मेलजोल है। एंड्रो ग्रीक का और दमस प्राकृत का शब्द है। ग्रीक में एंड्रो का अर्थ पुरुष तथा प्राकृत में दमस का अर्थ जीतने वाला होता है। एंड्रो - दमस का अर्थ " जीतने वाला पुरुष " हुआ। चंद्रगुप्त मौर्य को एंड्रो - कोट्टस ( Andro- Cottus ) क्यों कहा जाता है? एंड्रो - कोट्टस में दो शब्दों का मेलजोल है। एंड्रो ग्रीक का और कोट्टस प्राकृत का शब्द है। ग्रीक में एंड्रो का अर्थ पुरुष तथा प्राकृत में कोट्टस का अर्थ किले वाला होता है। एंड्रो - कोट्टस का अर्थ " किले वाला पुरुष " हुआ। चंद्रगुप्त मौर्य को यूनानियों ने " किला - पुरुष " यूँ ही नहीं कहा है। पाटलिपुत्र की किलेबंदी ऐसी कि पक्षी भी पर नहीं मार सके। किलेबंदी को देखकर मेगस्थनीज चकित थे। मेगस्थनीज ने लिखा कि पाटलिपुत्र की किलेबंदी ऐसी कि नगर के चारों ओर मोटी लकड़ी की दीवार थी। दीवार के बीच - बीच में मोर्चे बने थे ...

शूद्रों का सच्चा इतिहास जाने

 शूद्रों का सच्चा इतिहास,,,,,,,, आज भारत के बाहर निकलों तो सारी दुनिया को भारत का इतिहास पता है। अगर केाई भारतीय विदेशियों को अपना इतिहास बताता है तो सभी विदेशी बहुत हंसते है, मजाक बनाते है। सारी दुनिया को भारत का इतिहास पता है, फिर भी भारत के 95 प्रतिशत लोगो को अंधेरे में रखा गया है। क्योकि अगर भारत का सच्चा इतिहास सामने आ गया तो ब्राम्हणों, राजपूतों और वैश्यों द्वारा समाज के सभी वर्गो पर किये गए अत्याचार सामने आ जायेंगे, और देश के लोग हिन्दू नाम के तथाकथित धर्म की सच्चाई जानकर हिन्दू धर्म को मानने से इंकार कर देंगे। कोई भी भारतवासी हिन्दू धर्म को नहीं मानेगा। ब्राम्हणों का समाज में जो वर्चस्व है, वो समाप्त हो जायेगा। बहुत से लोग यह नहीं जानते कि भारत में कभी देवता थे ही नहीं, और न ही असुर थे। ये सब कोरा झूठ है, जिसको ब्राम्हणो ने अपने अपने फायदे के लिए लिखा था, और आज ब्राम्हण वर्ग इन सब बातों के द्वारा भारत के समाज के हर वर्ग को बेवकुफ़ बना रहा है। अगर आम आदमी अपने दिमाग पर जोर डाले और सोचे, तो सारी सच्चाई सामने आ जाती है। ब्राम्हण, राजपूत और वैश्य ईसा से 3200 साल पहले में भारत मं...

कहीं बुद्ध पुत्र राहुल तो हनुमान नहीं ?

 #बुद्ध_पुत्र_राहुल एक महान धम्म धम्म प्रचारक थे। वे अपने करुणामय स्वभाव और त्यागी वृत्ति से अर्हंत पद पर पोहच गए। संघ के अनुशासन की जिम्मेवारी आदरणीय भंते राहुल पर थी। भिखखु संघ में सम्मलित होने वाले श्रमनेरो को प्रशिक्षित करने की मुख्य जिम्मवारी भंते राहुल की थी। महायानी बुद्धिज़्म के अनुसार, जापान में #sonja सोंजा याने, #अर्हत_पद तक पोहचे हुवे भंते। #sonja यह #संत शब्द से मिलता जुलता शब्द है जापान में 16 अर्हत songa को पूजनीय मानते है, उसमेसे ही एक  #Ragora_Sonja (रेगोरा सोंग्ज़ा) एक है। यह Ragora Sonja यह कोई और नहीं बल्कि, बुद्ध पुत्र राहुल है। जापानी वर्णमाला में ला के बदले रा यह वर्ण है। ब्राह्मणी साहित्य यह बुद्धोत्तर साहित्य है इसमें कोई संदेह नही, रामायण के सारे पात्र यह बुद्ध जातक और बुद्ध इतिहास से प्रेरित है। हनुमान यह भी एक ऐसा ही character है। हनुमान की मूर्ति जिसके सीने में राम की प्रतिमा होती है,  मूर्ति बुद्ध पुत्र भंते राहुल की मूर्ति की नकल है। इतना ही नही, हनुमान चालीसा भी बुद्ध के जयमंगल अठ्ठ गाथा से चुराई गई है या फिर उससेही प्रेरित है। जपान में भंते ...

दीपावली का त्यौहार क्यों मनाया जाता है जानिए

 दीपावली एक बौद्ध उत्सव है। लोकपहात्ती ग्रंथ में बताया गया है कि, बुद्ध के सम्मान मे सम्राट अशोक ने 84000 स्तुप बनवाये थे और उनके पूर्ण होने पर दीप जलाकर उत्सव किया था। उस उत्सव में अवरोध डालने के लिए मारा ने हवा और पानी से आक्रमण किया और दीपों को बुझाने की कोशिश की। तब सम्राट अशोक के मुख्य भिक्खु उपगुप्त ने मारा से संघर्ष किया और उसे हराया था।  अशोक के दीपोत्सव का संबंध थायलंड के लोय कोरांग फेस्टिवल से है, जो आक्टोबर-नोव्हेंबर में मनाया जाता है और जिसमें लोग हजारों की संख्या में दीप जलाते हैं। सम्राट अशोक ने नये बदलाव नहीं किए थे बल्कि प्राचीन बौद्ध परंपरा को अधिक विस्तृत किया था| बुद्धत्व प्राप्ति के बाद कपिलवस्तु में बुद्ध का बडे़ उत्साह के साथ वहां के शाक्यों ने स्वागत किया था और दिप जलाकर अपनी खुशी का इजहार कर दिया था| आगे चलकर सम्राट अशोक ने इस दिपोत्सव के दिन 84000 स्तुपों के पुर्ण होने का उत्सव मनाया था| अशोक ने सभी चौरासी हजार स्तुपों पर दिप जलाकर बुद्ध की कपिलवस्तु भेंट को बडे़ पैमाने पर उत्सव के रुप में मनाया था| इस तरह, दिपावली उत्सव वास्तव में तथागत बुद्ध और सम्रा...

राष्ट्रीय एकता दिवस क्यों मनाया जाता है ?

  31 अक्टूबर को क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय एकता दिवस?          जानें- इसका महत्व और इतिहास :--  31 अक्टूबर को सरदार वल्लभ भाई पटेल की जयंती मनाई जाती है।  भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को चिह्नित करने के लिए 2014 से हर साल 31 अक्टूबर को नेशनल यूनिटी दिवस या राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है। इस वर्ष स्वतंत्रता सेनानी वल्लभभाई पटेल की 144 वीं जयंती है। सरदार वल्लभ भाई ने 565 रियासतों का विलय कर भारत को एक राष्ट्र बनाया था। यही कारण है कि वल्लभ भाई पटेल की जयंती के मौके पर राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जाता है।     इसका महत्व...........    भारत जैसा देश, जो विविधताओं से भरा है, जहां धर्म, जाति, भाषा, सभ्यता और संस्कृतियां, एकता को बनाए रखना बहुत महत्वपूर्ण है। इसलिए, राष्ट्र की एकता को स्थापित करने के लिए भारत सरकार ने 2014 में राष्ट्रीय एकता दिवस का प्रस्ताव रखा। चूंकि, सरदार पटेल भारत के एकीकरण के लिए जाने जाते हैं, इसलिए राष्ट्रीय एकता दिवस उनकी जयंती (31 अक्टूबर) को हर साल मनाया जाता है।✍️ 🌷इसका इतिहास.....

दीपावली क्यों मनाया जाता है पूरी जानकारी पढ़िए

 इतिहास के पन्नों से... ‘दीपदानोत्सव’,   दीपावली अथवा ‘दीपदानोत्सव’........ ✍️की बुद्ध धम्म में ऐतिहासिकता ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाय तो ‘दीपावली’ को ‘दीपदानोत्सव’ नाम से जाना जाता था और यह वस्तुतः एक बौद्ध पर्व है जिसका प्राचीनतम वर्णन तृतीय शती ईसवी के उत्तर भारतीय बौद्ध ग्रन्थ ‘अशोकावदान’ तथा पांचवीं शती ईस्वी के सिंहली बौद्ध ग्रन्थ ‘महावंस’ में प्राप्त होता है। सांतवी शती में सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी नृत्यनाटिका ‘नागानन्द’ में इस पर्व को ‘दीपप्रतिपदोत्सव’ कहा है।  ✍️कालान्तर में इस पर्व का वर्णन पूर्णतः परिवर्तित रूप में ‘पद्म पुराण’ तथा ‘स्कन्द पुराण’ में प्राप्त होता है जो कि सातवीं से बारहवीं शती ईसवी के मध्य की कृतियाँ हैं। तृतीय शती ईसा पूर्व की सिंहली बौध्द ‘अट्ठकथाओं’ पर आधारित ‘महावंस’ पांचवीं शती ईस्वी में भिक्खु महाथेर महानाम द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसके अनुसार बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद तथागत बुद्ध अपने पिता शुद्धोदन के आग्रह पर पहली बार कार्तिक अमावस्या के दिन कपिलवस्तु पधारे थे। कपिलवस्तु नगरवासी अपने प्रिय राजकुमार, जो अब बुद्धत्व प्राप्त क...

मृत्यु भोज निवारण अधिनियम 25 अक्टूबर 1960 को लागू किया गया

 🌷नित्य प्रेरणा-अपनी बात 🙏 📖 इतिहास के पन्नों से... 25 अक्टूबर, 📚✍️   🌷मृत्युभोज निषेध : 25 अक्टूबर... 🌷एक वीभत्स कुरीति..... ✍️मानव विकास के रास्ते में यह गंदगी कैसे पनप गयी, समझ से परे है। जानवर भी साथी के मरने पर मिलकर वियोग प्रकट करते हैं, परन्तु यहाँ भोज करते हैं। घर में खुशी का मौका हो, तो समझ आता है लेकिन किसी व्यक्ति के मरने पर मिठाईयाँ परोसी जायें, खाई जायें, इस शर्मनाक परम्परा को मानवता की किस श्रेणी में रखें। कहीं कहीं यह हैसियत दिखाने का अवसर बन जाता है। आस-पास के कई गाँवों से ट्रेक्टर-ट्रोलियों में गिद्धों की भांति जनता इस घृणित भोज पर टूट पड़ती है। क़स्बों में विभिन्न जातियों की ‘न्यात’ एक साथ इस भोज पर जमा होती है। शिक्षित व्यक्ति भी इस जाहिल कार्य में बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। इससे समस्या और विकट हो जाती है, क्योंकि अशिक्षित लोगों के लिए इस कुरीति के पक्ष में तर्क जुटाने वाला पढ़ा-लिखा वकील खड़ा हो जाता है। 🌷मूल परम्परा क्या थी ?.... ✍️लेकिन जब हमने 80-90 वर्ष के बुज़ुर्गों से इस कुरीति के चलन के बारे में पूछा, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आये। उन्होंने बताया...