सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

फातिमा शेख का जीवन परिचय || भारत कि पहली मुस्लिम शिक्षिका कौन थी?

 फातिमा शेख : जन्मदिन 9 जनवरी 1831

(9.1.1831-9.10.1900)

  पहली मुस्लिम शिक्षिका......

  जिन्होंने क्रांतिसूर्य फुले दंपत्ति के साथ मिलकर लड़कियों में 170+ वर्ष पहले शिक्षा की मशाल जलाई...

   आज से 170+ वर्ष पहले तक भी शिक्षा बहुसंख्य लोगों तक नहीं पहुंच पाई थी. जब विश्व आधुनिक शिक्षा में काफी आगे निकल चुका था, तब भारत में बहुसंख्य लोग शिक्षा से वंचित थे. लडकियों की शिक्षा का तो पूछो मत क्या हाल था. जोतिबा फुले पूना (अब पुणे) में 1827 में पैदा हुए. उन्होंने बहुजनों की दुर्गति को बहुत ही निकट से देखा था. उन्हें पता था कि इसका कारण अशिक्षा ही है. इसीलिए वे चाहते थे कि बहुसंख्य लोगों के घरों तक शिक्षा का प्रचार प्रसार होना ही चाहिए. विशेषतः वे लड़कियों के शिक्षा के जबरदस्त पक्षधर थे. इसका आरंभ उन्होंने अपने घर से ही किया. उन्होंने सबसे पहले अपनी संगिनी सावित्रीबाई को शिक्षित किया. जोतिबा अपनी संगिनी को शिक्षित बनाकर अपने कार्य को और भी आगे ले जाने की तैयारियों में जुट गए.

   यह बात उस समय के वर्णधर्मियों को बिलकुल भी पसंद नहीं आई. उनका चारों ओर से विरोध होने लगा. जोतिबा फिर भी अपने कार्य को मजबूती से करते रहे. जोतिबा नहीं माने तो उनके पिता गोविंदराव पर दबाव बनाया गया. अंततः पिता को भी प्रस्थापित व्यवस्था के सामने विवश होना पड़ा. मज़बूरी में जोतिबा को अपना घर छोड़ना पडा. 

   उनके एक दोस्त उस्मान शेख पूना के गंज पेठ में रहते थे. उन्होंने रहने के लिए अपना घर दिया. उस्मान शेख भी लड़कियों की शिक्षा के महत्व को समझते थे. उनकी एक बहन फातिमा थीं. उस्मान शेख ने अपनी बहन के दिल में शिक्षा के प्रति रुचि निर्माण की. सावित्रीबाई के साथ वह भी लिखना-पढ़ना सीखने लगीं. बाद में उन्होंने शैक्षिक सनद प्राप्त की. उस्मान शेख के यहीं  जोतिबा ने 1848 में अपना पहला स्कूल शुरू किया.

   क्रांतिसूर्य फुले दंपत्ति ने लड़कियों के लिए कई स्कूल कायम किए. सावित्रीबाई और फातिमा ने वहां पढ़ाना शुरू किया. वो जब भी रास्ते से गुजरतीं तो लोग उनकी हंसी उड़ाते, उन्हें पत्थर मारते और उन पर गोबर फेंकते थे. दोनों इस ज्यादती को सहन करती रहीं, लेकिन उन्होंने अपना काम बंद नहीं किया.  फातिमा शेख के जमाने में लड़कियों की शिक्षा में असंख्य रुकावटें थीं. ऐसे जमाने में उन्होंने स्वयं शिक्षा प्राप्त की. दूसरों को लिखना-पढ़ना सिखाया. वे शिक्षा देने वाली पहली मुस्लिम महिला थीं, जिनके पास शिक्षा की सनद थी.

फातिमा शेख ने लड़कियों की शिक्षा के लिए जो सेवाएं दीं, उसे भुलाया नहीं जा सकता. घर-घर जाना, लोगों को शिक्षा की आवश्यकता समझाना, लड़कियों को स्कूल भेजने के लिए उनके अभिभावकों की खुशामद करना, फातिमा शेख की आदत बन गई थी. आखिर उनकी मेहनत रंग लाने लगी. लोगों के विचारों में परिवर्तन आया. वे अपनी घरों की लड़कियों को स्कूल भेजने लगे. लड़कियों में भी शिक्षा के प्रति रूचि निर्माण होने लगी. स्कूल में उनकी संख्या बढती गयी. मुस्लिम लड़कियां भी खुशी-खुशी स्कूल जाने लगीं.

   विपरीत परिस्थितियों में प्रस्थापित व्यवस्था के विरोध में जाकर शिक्षा के महान कार्य में फूले दंपत्ति को मौलिकता के साथ सहयोग देने वाली एक वीर मानवतावादी शिक्षिका फातिमा शेख को दिल से सलाम… 

भारत में पहली मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख को कोटिशः नमन--

भारत में पहला कन्या स्कूल खोलने वाली समाजसुधारक सावित्रीबाई फुले का 3 जनवरी 1831 को जन्म हुआ.

सावित्रीबाई फुले आज प्रथम शिक्षिका की वजह से हर जगह  टॉप ट्रेंड्स में शामिल हैं.सावित्रीबाई का निधन 10 मार्च 1897 को प्लेग बीमारी की वजह से हुआ था. पर क्या आपको पता है भारत का पहला कन्या स्कूल खोलने में फ़ातिमा शेख़ ने सावित्रीबाई फुले की मदद की थी.लेकिन फ़ातिमा शेख़ आज गुमनाम हैं और उनके नाम का उल्लेख कम ही मिलता है-

फ़ातिमा शेख़ सावित्रीबाई फुले की सहयोगी थीं. जब ज्योतिबा और सावित्री फुले ने लड़कियों के लिए स्कूल खोलने का बीड़ा उठाया, तब फ़ातिमा शेख़ ने भी इस मुहिम में उनका साथ दिया.उस ज़माने में अध्यापक मिलने मुश्किल थे. फ़ातिमा शेख़ ने सावित्रीबाई के स्कूल में पढ़ाने की ज़िम्मेदारी भी संभाली. इसके लिए उन्हें समाज के विरोध का भी सामना करना पड़ा.फुले के पिता ने जब दलितों और महिलाओं के उत्थान के लिए किए जा रहे उनके कामों की वजह से उनके परिवार को घर से निकाल दिया था, तब फ़ातिमा शेख़ के बड़े भाई उस्मान शेख़ ने ही उन्हें अपने घर में जगह दी.

फ़ातिमा शेख़ और उस्मान शेख़ ने ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई को उस मुश्किल समय में बेहद अहम सहयोग दिया था.लेकिन अब बहुत कम ही लोग उस्मान शेख़ और फ़ातिमा शेख़ के बारे में जानते हैं 


बी.एल. बौद्ध



<script async src="https://pagead2.googlesyndication.com/pagead/js/adsbygoogle.js?client=ca-pub-5460100888476302"
     crossorigin="anonymous"></script>

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बाबा साहब की अस्थियां आगरा में कब रखी गई | बाबा साहब की हस्तियां आगरा में किसके द्वारा रखी गई

   बाबा साहब की अस्थियां आगरा में : 13 फरवरी....   आगरा के पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार में रखी है बाबा साहेब की अस्थियां..    13.2.1957 को बाबासाहेब के पुत्र यशवंत राव अंबेडकर द्वारा उनकी अस्थियां आगरा लाई गईं और पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार में स्थापित की गयी है। हर वर्ष छह दिसम्बर को डॉ. अंबेडकर के महापरिनिवार्ण दिवस पर ये अस्थियां जनता के दर्शनार्थ बुद्ध विहार में रखी जाती हैं।       पूर्वोदय चक्कीपाट बुद्ध विहार की ज़मीन रक्षा विभाग की है और वह इस ऐतिहासिक बौद्ध विहार को हटाने के लिए बार बार कहता है। भदंत ज्ञान रत्न महाथेरा भारत सरकार से अपील करते हुए कहते है की इस ज़मीन को रक्षा विभाग से लेकर हमे दिया जाये ताकि हम बाबा साहेब की याद में भव्य स्मारक का निर्माण करा सके। विहार के हालत अभी खस्ता है।    18.3.1956 को रामलीला मैदान, आगरा में सभा करने के बाद बाबा साहब ने पूर्वोदय चक्कीपाट में तथागत बुद्ध की प्रतिमा अपने हाथों से स्थापित की जो आज भी पूर्वोदय बुद्ध विहार में देखी जा सकती है।      जुलाई 1957 को बौद्ध भिक्षु कौडि...

दीपावली क्यों मनाया जाता है पूरी जानकारी पढ़िए

 इतिहास के पन्नों से... ‘दीपदानोत्सव’,   दीपावली अथवा ‘दीपदानोत्सव’........ ✍️की बुद्ध धम्म में ऐतिहासिकता ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाय तो ‘दीपावली’ को ‘दीपदानोत्सव’ नाम से जाना जाता था और यह वस्तुतः एक बौद्ध पर्व है जिसका प्राचीनतम वर्णन तृतीय शती ईसवी के उत्तर भारतीय बौद्ध ग्रन्थ ‘अशोकावदान’ तथा पांचवीं शती ईस्वी के सिंहली बौद्ध ग्रन्थ ‘महावंस’ में प्राप्त होता है। सांतवी शती में सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी नृत्यनाटिका ‘नागानन्द’ में इस पर्व को ‘दीपप्रतिपदोत्सव’ कहा है।  ✍️कालान्तर में इस पर्व का वर्णन पूर्णतः परिवर्तित रूप में ‘पद्म पुराण’ तथा ‘स्कन्द पुराण’ में प्राप्त होता है जो कि सातवीं से बारहवीं शती ईसवी के मध्य की कृतियाँ हैं। तृतीय शती ईसा पूर्व की सिंहली बौध्द ‘अट्ठकथाओं’ पर आधारित ‘महावंस’ पांचवीं शती ईस्वी में भिक्खु महाथेर महानाम द्वारा रचित महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसके अनुसार बुद्धत्व की प्राप्ति के बाद तथागत बुद्ध अपने पिता शुद्धोदन के आग्रह पर पहली बार कार्तिक अमावस्या के दिन कपिलवस्तु पधारे थे। कपिलवस्तु नगरवासी अपने प्रिय राजकुमार, जो अब बुद्धत्व प्राप्त क...

धम्मदीक्षा दिवस (धम्मचक्रप्रवर्तन दिवस) 14 अक्टूबर

 धम्मदीक्षा दिवस (धम्मचक्रप्रवर्तन दिवस)14अक्टूबर पर आप सभी साथियों को बहुत बहुत हार्दिक बधाई-- डा.बाबासाहब अम्बेडकर ने 1935 में घोषणा की थी कि मैं हिंदू धर्म में पैदा अवश्य हुआ हूं परंतु हिंदू के रूप से मरूँगा नहीं  उन्होंने सभी धर्मों का भली-भीति अध्ययन किया और पाया कि केवल बौद्ध धम्म ही विज्ञान की कसौटी पर पूरा उतरता हे ये धर्म समानता,स्वतंत्रता,न्याय व प्रज्ञा (ज्ञान) पर आधारित है,इसमें मानव प्रेम, अपनापन ब भाईचारा है यह भ्रमो के जाल में नही फसाता है इसमें कर्मकांड और पाखंड नहीं है, यह ना तो स्वर्ग या मुक्ति का प्रलोभन देता है और ना ही आत्मा और परमात्मा के चक्कर में उलझाता है इसमें न तो देवी-देवताओं को खुश करना होता है और न ही देवी-देवताओं से डरना होता है,इसमें देवी-देवताओं द्वारा किसी अनिष्ट का भी कोई डर नहीं होता, इसमें तो केबल बुद्ध की शिक्षाओं को जीवन में उतार कर दुख और भय से मुक्त होकर ‘संपूर्ण मानव’ जीवन जीना होता है, उन्होंने पाया कि बौध धम्म ‘अत्त दीपो भव’ अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो का सिद्धांत देकर मनुष्य को अपने आप पर निर्भर होना सिखाता है.    उन्होंने ...